50 संत कबीर के दोहे – Kabir Ke Dohe

संत कबीर जी का नाम हममें से हर कोई ने सुना है और इनके कई लोगों को हमने स्कूल के समय में भी पढ़ा है. जो हिंदी भाषा के छात्र होते हैं। उन्हें अनेकों प्रकार के लेखकों की जीवनी और उनके द्वारा लिखे हुए दोहे को भी पढ़ना पड़ता है. इस पोस्ट के माध्यम से हमने आपके लिए कबीर के दोहे (Kabir ke dohe) लाए हैं जो निश्चित रूप से आपको पसंद आएंगे.

संत कबीर ने अपने जीवन काल में अनेक दोहे का निर्माण किया जो अलग-अलग भावों पर आधारित होते है. भाव से यहां मतलब यह है कि हम अपने जीवन में अनेक प्रकार की भावनाओं से सामना करते हैं जैसे कभी क्रोध, प्रसन्नता, बुद्धिमत्ता, काल, माया, बंधन, वाणी इत्यादि।

इन सभी भाव को प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने उन पर आधारित रचनाओं को लोगों के लिए लिखा। जिन्हें आज भी लोग का शौक से पढ़ते हैं और पसंद भी करते हैं हमने इन दोनों को उनके अर्थ के साथ लाया है जिससे आपको उन्हें समझने में आसानी होगी।

कबीर के दोहे हिंदी में

Kabir Ke Dohe

बुद्धिमत्ता

1

जिनमे जितनी बुद्धि है, तितनो देत बताय
वाको बुरा ना मानिये, और कहां से लाय।

अर्थ : जिसे जितना ज्ञान एंव बुद्धि है उतना वह बता देते हैं। तुम्हें उनका बुरा नहीं मानना चाहिये।
उससे अधिक वे कहाॅं से लावें। यहाॅं संतो के ज्ञान प्राप्ति के संबंध कहा गया है।

2

जीना थोड़ा ही भला, हरि का सुमरन होई
लाख बरस का जीवना, लिखै धरै ना कोई।

अर्थ :
एक संक्षिप्त जीवन जिसमें प्रभु का स्मरण किया जाये-अच्छा है परंतु लाखों वर्षों का
जीवन भी वेकार है क्योंकि उसका हिसाब किताब कौन कैसे रख सकते है।

3

चिंता चित्त बिसारिये, फिर बुझिये नहीं आन
इंद्री पसारा मेटिये सहज मिले भगवान।

अर्थ :
समस्त चिंताओं को अपने मन से निकाल दें। इसके सबंध मे कभी न सोचें।
अपने सभी बुराइयों और गलतियों का नियंत्रन करें तो ईश्वर की प्राप्ति आसानी से हो सकती है।

4

कागद केरी नाव री, पानी केरी गंग
कहे कबीर कैसे तिरे, पाॅंच कुसंगी संग।

अर्थ :
यह शरीर कागज की तरह नाश होने वाला है जो दुनिया रुपी नदी के इच्छााओं-वासनावओं में डूबा हुआ है।
जब तक अपने पाॅंचों ज्ञानेद्रियों पर नियंत्रण नहीं कर लिया जाता है तब तक इस संसार से मुक्ति नहीं हो सकती।

 

5

जेती लहर समुद्र की, तेती मन की दौर
सहजय हीरा नीपजय, जो मन आबै ठौर।

अर्थ :
समुद्र मे जिस तरह असंख्य लहरें उठती है उसी प्रकार मन विचारों कर अनगिनत तरंगे आती-जाती है।
यदि अपने मन को सहज, सरल और शांत कर लिया जाये तो सत्य का ज्ञान संभव है।

6

मन चलता तन भी चले, ताते मन को घेर
तन मन दोई बसि करै, राई होये सुमेर।

अर्थ :
शरीर मन के अनुसार क्रियाशील होता है। अर्थात सबसे पहले मन पर नियंत्रण करें
जो व्यक्ति अपने मन और शरीर दोंनो का नियंत्रन कर लेता है
वह तुरंत ही एक अन्न के दाने से सुमेरु पर्वत के समान प्रभावशाली एवं वैभवशील हो सकता है।

7

तरुबर पात सो युॅं कहे सुनो पात एक बात
या घर यही रीति है एक आबत एक जात।

अर्थ :
वृक्ष पत्तों से एक बात सुनने का आग्रह करता है की यहाॅं संसार में एक आने और जाने का रिवाज है।
जीवन एंव मृत्यु का यह चक्र अविरल चलता रहता है।

8

तन का बैरी काइे नहीं जो मन सीतल होय
तु आपा केा डारि दे दया करे सब कोय।

अर्थ :
यदि आप अपने मन को शांत एंव शीतल रखंे तो कोई भी आपका दुश्मन नहीं होगा
यदि आप अपनी प्रतिष्ठा एंव घमंड को दूर रखें तो सारा संसार आपको प्रेम करेगा।

9

मांगन मरन समान है तोहि दयी मैं सीख
कहे कबीर समुझाइ के मति मांगे कोइ भीख।

अर्थ :
कबीर शिक्षा देते हैं कि माॅंगना मृत्यु के समान है। कबीर समझाकर कहते है की कोई भी व्यक्ति
भीख नहीं माॅंगे। यहाॅं कबीर कर्मशील बनने की शिक्षा देते है।

10

हिन्दू तुरक के बीच में मेरा नाम कबीर
जीव मुक्तवन कारने अबिकत धरा सरीर।

अर्थ :
हिन्दू और मुस्लिम के बीच मेरा नाम कबीर के नाम से जाना जाता है। मैंने अज्ञानी लोगों को अधर्म और
पाप से मुक्त करने हेतु शरीर धारन किया है।

11

पाहन ही का देहरा पाहन ही का देव
पूजनहारा आंधरा क्यों करि माने सेव।

अर्थ :
पथ्थर के बने मंदिर में भगवान भी पथ्थर के हीं हैं।
यदि पूजा करने वाला पूजारी अन्धे की तरह विवेकहीन है तो ईश्वर उसकी पूजा से कैसे प्रसन्न होंगे।

12

तन का बैरी कोई नहीं जो मन सीतल होये
तु आपा को डारी दे, दया करै सब कोई।

अर्थ :
यदि तुम्हारा मन शांत,निर्मल एंव पवित्र है तो तुम्हारा कोई शत्रु नही है।
यदि तुमने अपने मान-समान-अभिमान का परित्याग कर दिया है तो सारा संसार तुमसे प्रेम करेगा।

13

चिउटी चावल ले चली बीच मे मिलि गयी दाल
कहे कबीर दौउ ना मिलै एक लै दूजी दाल।

अर्थ :
चींटी चावल का दाना लेकर चली तो बीच में उसे दाल मिला पर वह दोनों नहीं पा सकती है।
उसे एक छोड़ना पड़ेगा। प्रभु भक्तिके लिये उसे संसारिक माया-मोह छोड़ना होगा।

14

जेती लहर समुद्र की, तेती मन की दौर
सहजय हीरा नीपजय, जो मन आबै ठौर।

अर्थ :
समुद्र मे जिस तरह असंख्य लहरें उठती है उसी प्रकार मन विचारों कर अनगिनत तरंगे आती-जाती है।
यदि अपने मन को सहज, सरल और शांत कर लिया जाये तो सत्य का ज्ञान संभव है।

15

मन से हारे हार है, मन के जीते जीत,
कहे कबीर गुरु पाइये,मन ही के परतीत।

अर्थ :
यदि मन से उत्साह पूर्वक जीत अनुभव करते हैं तो अवश्य आप की जीत होगी।
यदि आप हृदय से गुरु की खोज करेंगे तो निश्चय हीं आपको सदगुरु मिलकर रहेंगे।

16

तन का बैरी कोई नहीं जो मन सीतल होये
तु आपा को डारी दे, दया करै सब कोई।

अर्थ :
यदि तुम्हारा मन शांत,निर्मल एंव पवित्र है तो तुम्हारा कोई शत्रु नही है।
यदि तुमने अपने मान-समान-अभिमान का परित्याग कर दिया है तो सारा संसार तुमसे प्रेम करेगा।

17

चिउटी चावल ले चली बीच मे मिलि गयी दाल
कहे कबीर दौउ ना मिलै एक लै दूजी दाल।

अर्थ :
चींटी चावल का दाना लेकर चली तो बीच में उसे दाल मिला पर वह दोनों नहीं पा सकती है।
उसे एक छोड़ना पड़ेगा। प्रभु भक्तिके लिये उसे संसारिक माया-मोह छोड़ना होगा।

18

कबीर गर्व ना कीजिये उंचा देखि आवास
काल परौ भंुयी लेटना उपर जमसी घास।

अर्थ :
कबीर अपने उॅंचें गृह आवास को देखकर घमंड नहीं करने की सलाह देते हैं।
संभव है कल्ह तुम्हें जमीन पर लेटना होगा जिस पर घास उगेंगेे।

19

आबत सब जग देखिया, जात ना देखी कोई
आबत जात लखई सोई जाको गुरुमत होई।

अर्थ :
बालक के जन्म को सब देखते हैं पर किसी की मृत्यु के बाद उसकी क्या दशा हुई-कोई नहीं जानता।
आने-जाने के इस रहस्य को वही समझ पाता है जिसनेे गुरु से आत्म तत्व कर ज्ञान प्राप्त किया हो।

20

हिन्दू तो तीरथ चले मक्का मुसलमान
दास कबीर दोउ छोरि के हक्का करि रहि जान।

अर्थ :
हिन्दू तीर्थ करने जाते हैं।मुसलमान मक्का जाते हैं।
कबीर दास दोनो छोड़कर परमात्माके निवास आत्मा में बसते हैं।

21

हिंदु कहुॅं तो मैं नहीं मुसलमान भी नाहि
पंच तत्व का पूतला गैबी खेले माहि।

अर्थ :
मैं न तो हिन्दु हूॅ अथवा नहीं मुसलमान। इस पाॅंच तत्व के शरीर में बसने वाली
आत्मा न तो हिन्दुहै और न हीं मुसलमान।

22

पाया कहे तो बाबरे,खोया कहे तो कूर
पाया खोया कुछ नहीं,ज्यों का त्यों भरपूर।

अर्थ :
जो व्यक्ति कहता है कि उसने पा लिया वह अज्ञानी है और जो कहता है
कि उसने खो दिया वह मूढ़ और अविवेकी है ईश्वर तत्व में पाना और खोना नहीं है
कारण वह सर्वदा सभी चीजों में पूर्णत्व के साथ उपस्थित है।

23

दुखिया मुआ दुख करि सुखिया सुख को झूर
दास आनंदित राम का दुख सुख डारा दूर।

अर्थ :
दुखी प्राणी दुख मे मरता रहता है एंव सुखी व्यक्ति अपने सुख में जलता रहता है
पर ईश्वर भक्त हमेशा दुख-सुख त्याग कर आनन्द में रहता है।

 

कबीर के दोहे(अनुभव)

24

अंधो का हाथी सही, हाथ टटोल-टटोल
आंखो से नहीं देखिया, ताते विन-विन बोल।

अर्थ :
वस्तुतः यह अंधों का हाथी है जो अंधेरे में अपने हाथों से टटोल कर उसे देख रहा है । वह अपने आॅखों से उसे नहीं देख रहा है
और उसके बारे में अलग अलग बातें कह रहा है । अज्ञानी लोग ईश्वर का सम्पुर्ण वर्णन करने में सझम नहीं है.

25

ज्ञानी भुलै ज्ञान कथि निकट रहा निज रुप
बाहिर खोजय बापुरै, भीतर वस्तु अनूप।

अर्थ :
तथाकथित ज्ञानी अपना ज्ञान बघारता है जबकी प्रभु अपने स्वरुप में उसके अत्यंत निकट हीं रहते है।
वह प्रभु को बाहर खोजता है जबकी वह अनुपम आकर्षक प्रभु हृदय के विराजमान है।

26

वचन वेद अनुभव युगति आनन्द की परछाहि
बोध रुप पुरुष अखंडित, कहबै मैं कुछ नाहि।

अर्थ :
वेदों के वचन,अनुभव,युक्तियाॅं आदि परमात्मा के प्राप्ति के आनंद की परछाई मात्र है। ज्ञाप स्वरुप एकात्म आदि पुरुष परमात्मा के बारे में मैं कुछ भी नहीं बताने के लायक हूॅं।

27

ज्ञानी मूल गंवायीयाॅ आप भये करता
ताते संसारी भला, सदा रहत डरता।

अर्थ :
किताबी ज्ञान वाला व्यक्ति परमात्मा के मूल स्वरुप को नहीं जान पाता है। वह ज्ञान के दंभ में स्वयं को ही कर्ता भगवान समझने लगता है।
उससे तो एक सांसारिक व्यक्ति अच्छा है जो कम से कम भगवान से डरता तो है।

28

ज्यों गूंगा के सैन को, गूंगा ही पहिचान
त्यों ज्ञानी के सुख को, ज्ञानी हबै सो जान।

अर्थ :
गूंगे लोगों के इशारे को एक गूंगा ही समझ सकता है। इसी तरह एक आत्म ज्ञानी के आनंद को एक आत्म ज्ञानी ही जान सकता है।

29

अंधे मिलि हाथी छुवा, अपने अपने ज्ञान अपनी अपनी सब कहै, किस को दीजय कान।

अर्थ :
कई अंधों ने हाथी को सपर्श कर देखा और अपने अपने अनुभव का वर्णन किया।
सब अपनी अपनी बातें कहने लगें-अब किसकी बात का विश्वास किया जाये।

30

आतम अनुभव सुख की, जो कोई पुछै बात
कई जो कोई जानयी कोई अपनो की गात।

अर्थ :
परमात्मा के संबंध में आत्मा के अनुभव को किसी के पूछने पर वर्णन करना संभव नहीं है।
यह तो स्वयं के प्रयत्न,ध्यान,साधना और पुण्य कर्मों के द्वारा ही जाना जा सकता है।

31

ज्ञानी तो निर्भय भया, मानै नहीं संक
इन्द्रिन केरे बसि परा, भुगते नरक निशंक।

अर्थ :
ज्ञानी हमेशा निर्भय रहता है। कारण उसके मन में प्रभु के लिये कोई शंका नहीं होता।
लेकिन यदि वह इंद्रियों के वश में पड़ कर बिषय भोग में पर जाता है तो उसे निश्चय ही नरक भोगना पड़ता है।

32

भरा होये तो रीतै, रीता होये भराय
रीता भरा ना पाइये, अनुभव सोयी कहाय।

अर्थ :
एक धनी निर्धन और निर्धन धनी हो सकता है। परंतु परमात्मा का निवास होने पर वह कभी पूर्ण भरा या खाली
नहीं रहता। अनुभव यही कहता है। परमात्मा से पुर्ण हृदय कभी खाली नहीं-हमेशा पुर्ण ही रहता है।

33

भीतर तो भेदा नहीं, बाहिर कथै अनेक
जो पाई भीतर लखि परै, भीतर बाहर एक।

अर्थ :
हृदय में परमात्मा एक हैलेकिन बाहर लोग अनेक कहते है।
यदि हृदय के अंदर परमात्मा का दर्शण को जाये तो वे बाहर भीतर सब जगह
एक ही हो जाते है।

34

लिखा लिखि की है नाहि, देखा देखी बात
दुलहा दुलहिन मिलि गये, फीकी परी बरात।

अर्थ :
परमात्मा के अनुभव की बातें लिखने से नहीं चलेगा। यह देखने और अनुभव करने की बात है।
जब दुल्हा और दुल्हिन मिल गये तो बारात में कोई आकर्षण नहीं रह जाता है।

35

बूझ सरीखी बात हैं, कहाॅ सरीखी नाहि
जेते ज्ञानी देखिये, तेते संसै माहि।

अर्थ :
परमांत्मा की बातें समझने की चीज है। यह कहने के लायक नहीं है।
जितने बुद्धिमान ज्ञानी हैं वे सभी अत्यंत भ्रम में है।

36

ज्ञानी युक्ति सुनाईया, को सुनि करै विचार
सूरदास की स्त्री, का पर करै सिंगार।

अर्थ :
एक ज्ञानी व्यक्ति जो परामर्श तरीका बतावें उस पर सुन कर विचार करना चाहिये।
परंतु एक अंधे व्यक्ति की पत्नी किस के लिये सज धज श्रंृगार करेगी।

37

निरजानी सो कहिये का, कहत कबीर लजाय
अंधे आगे नाचते, कला अकारथ जाये।

अर्थ :
अज्ञानी नासमझ से क्या कहा जाये। कबीर को कहते लाज लग रही है।
अंधे के सामने नाच दिखाने से उसकी कला भी व्यर्थ हो जाती है।
अज्ञानी के सामने आत्मा एवं परमात्मा की बात करना व्यर्थ है।

38

नर नारी के सूख को, खांसि नहि पहिचान
त्यों ज्ञानि के सूख को, अज्ञानी नहि जान।

अर्थ :
स्त्री पुरुष के मिलन के सुख को नपुंसक नहीं समझ सकता है।
इसी तरह ज्ञानी का सुख एक मूर्ख अज्ञानी नहीं जान सकता है।

39

दूजा हैं तो बोलिये, दूजा झगड़ा सोहि
दो अंधों के नाच मे, का पै काको मोहि।

अर्थ :
यदि परमात्मा अलग अलग हों तो कुछ कहाॅ जाय। यही तो सभी झगड़ों की जड़ है।
दो अंधों के नाच में कौन अंधा किस अंस अंधे पर मुग्ध या प्रसन्न होगा?

40

ताको लक्षण को कहै, जाको अनुभव ज्ञान
साध असाध ना देखिये, क्यों करि करुन बखान।

अर्थ :
जिसे अनुभव का ज्ञान है उसके लक्षणों के बारे में क्या कहा जाय। वह साधु असाधु में भेद नहीं देखता है।
वह समदर्शी होता है। अतः उसका वर्णन क्या किया जाय।

41

ज्ञान भक्ति वैराग्य सुख पीव ब्रह्म लौ ध़ाये
आतम अनुभव सेज सुख, तहन ना दूजा जाये।

अर्थ :
ज्ञान,भक्ति,वैराग्य का सुख जल्दी से तेज गति से भगवान तक पहुॅंचाता है।
पर आत्मानुभव आत्मा और परमात्मा का मेल कराता है। जहाॅं अन्य कोई प्रवेश नहीं कर सकता है।

42

कहा सिखापना देत हो, समुझि देख मन माहि
सबै हरफ है द्वात मह, द्वात ना हरफन माहि।

अर्थ :
मैं कितनी शिक्षा देता रहूॅ। स्वयं अपने मन में समझों। सभी अक्षर दावात में है पर दावात
अक्षर में नहीं है। यह संसार परमात्मा में स्थित है पर परमात्मा इस सृष्टि से भी बाहर तक असीम है।

43

कागत लिखै सो कागदी, को व्यहाारि जीव
आतम द्रिष्टि कहां लिखै, जित देखो तित पीव।

अर्थ :
कागज में लिखे शास्त्रों की बात केवल दस्तावेज है। वह प्राणी का व्यवहारिक अनुभव नही है।
आत्म दृष्टि से प्राप्त व्यक्तिगत अनुभव कहीं लिखा नहीं रहता है। हम तो जहाॅ भी देखते है अपने प्यारे परमात्मा
को ही पाते हैं।

कबीर के दोहे (क्रोध)

44

जहां काम तहां नाम नहीं,जहां नाम नहि काम दोनो कबहू ना मिलैय रवि रजनी एक ठाम।

अर्थ :
जहाॅं काम,वसाना,इच्छा हो वहाॅं प्रभु नहीं रहते और जहाॅं प्रभु रहते है वहाॅं काम,वासना,इच्छा नहीं रह सकते। इन दोनों का मिलन असंभव है जैसे सुर्य एंव रात्रि का मिलन नहीं हो सकता।

45

यह जग कोठी काठ की, चहुं दिश लागी आाग भीतर रहै सो जलि मुअै, साधू उबरै भाग।

अर्थ :
यह संसार काठ के महल की भाॅंति है जिसके चतुर्दिक आगलगी है। इसके अंदर का प्राणी जल मरता है पर साधु बचकर भाग जाता है। यहाॅं क्रोध आग का परिचायक है। साधु समस्त क्रोध-विकार से वंचित है।

 

46

दसो दिशा से क्रोध की उठि अपरबल आग शीतल संगत साध की तहां उबरिये भाग।

अर्थ :
सम्पूर्ण संसार क्रोध की अग्नि से चतुर्दिक जल रहा है। यह आग अत्यंत प्रवल है। लेकिन संत साधु की संगति शीतल होती है जहाॅं हम भाग कर बच सकते हैं।

47

क्रोध अगिन घर घर बढ़ी, जलै सकल संसार दीन लीन निज भक्त जो तिनके निकट उबार।

अर्थ :
घर-घर क्रोध की अग्नि से सम्पूर्ण संसार जल रहा है परंतु ईश्वर का समर्पित भक्त इस क्रोध की आग से अपने को शीतल कर लेता है। वह सांसरिक तनावों एंव कष्ठों से मुक्त हो जाता है।

कबीर के दोहे(संतजन)

48

कहे कबीर हम ब्याहि चले हैं, पुरुख एक अबिनासी

अर्थ :
कबीर एक अमर अविनासी पुरुष को अपना पति मानते हैं।
यहॉं कबीर का ईश्वर के साथ दाम्पत्य प्रेम दिखाया हैं।

49

भग भोगे भग उपजे,भग से बचे ना कोइ
कहे कबीर भग ते बचे भक्त कहाबै सोऐ।

अर्थ :
भग भोग उत्पन्न करता है। इससे वचना अति कठिन है।
जो व्यक्ति इससे अपनी रक्षा करता है वस्तुतः वही भक्त हैं
भग का अर्थ कामना,इच्छा, भोग से हैं।

50

आशा तजि माया तजी मोह तजी और मन
हरख,शोक निंदा तजइ कहै कबीर संत जान।

अर्थ :
जो व्यक्ति आशा, माया और मोह को त्याग देता है
तथा जिसने सुख, शोक निन्दा का परित्याग करदिया है
कबीर के कथाअनुसार वही सत्य पर है।

51

साधु आबत देखि के चरन लागो धाऐ
क्या जानो इस वेश मे हरि आऐ मिली जाऐ।

अर्थ :
संत व्यक्ति को आते देखकर दौड़ के उनके चरणों का स्पर्श करें।
क्या मालूम कि एसी में प्रभु स्वयं आपसे मिलने आये हों।

निष्कर्ष

हम आशा करते हैं कि आपको ऊपर हमारे द्वारा दिए गए कबीर के दोहे जिन्हें हिंदी में हमने अर्थ के साथ लाया है वह आपको पसंद आया होगा। आप अगर स्कूल या कॉलेज में पढ़ रहे हैं और आप तो हिंदी के छात्र हैं तो फिर आपको इनकी खास की जरूरत पड़ सकती हैं.

आप यहां से इन दोनों के अर्थ को आसानी से समझ सकते हैं और अपने पढ़ाई के दौरान इसका इस्तेमाल भी कर सकते हैं.

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