Allama Iqbal Shayari in Hindi – 90+ Shayari for Whatsapp

अवलोकन: इस आर्टिकल के ज़रिये हम आपके लिए अल्लमा इक़बाल की मशहूर शायरी (Allama Iqbal shayari) लाएं हैं जिनको आप सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर शेयर कर  सकते हैं.

Short Biography of Allama Iqbal in Hindi

‘अल्लमा’ इक़बाल का असली नाम मोहम्मद इक़बाल था और इनका जन्म 9 नवंबर 1877 के अविभाजित भारत में हुआ था. इनकी शायरी और कविताओं को कुछ सर्वश्रेष्ठ शायरियों में गिना जाता है. ये एक कवि होने के साथ साथ एक दार्शनिक, और राजनेता भी थे. अल्लमा इक़बाल को ‘स्प्रिटुअल फादर ऑफ़ पाकिस्तान’ कहा जाता है और इनके चर्चे पाकिस्तान  में ही नहीं बल्कि भारत, बांग्लादेश, भूटान और ईरान में भी  हैं.

इक़बाल ने अपने जीवनकाल में बहुत सी प्रसिद्ध किताबें लिखीं जिनमे ज़्यादातर इन्होने कवितायेँ लिखीं हैं. ये कविताओं में उर्दू, हिंदी और पारसी भाषा का प्रयोग करते थे. लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं था की इन्हे केवल ये तीन भाषा ही आती थे. इक़बाल अंग्रेजी भाषा में भी निपुण थे. 1922 में मोहम्मद इक़बाल को किंग जॉर्ज 5 ने ‘नाइट बैचलर’ का सम्मान दिया.

दक्षिणी एशिया में इक़बाल को शाइर-ए-मशरिक़ भी कहा जाता  था. इसके अलावा इनको और भी कई उपाधियों से नवाज़ा  गया था जैसे की, मुफक्किर-ए-पाकिस्तान, मुसवार-ए-पाकिस्तान, हाकिम-उल-उम्मत. मोहम्मत इक़बाल को पाकिस्तान का राष्ट्रीय कवी भी कहा जाता है.

नीचे हम आपके लिए अल्लमा इक़बाल की कुछ मशहूर शायरी लाएं हैं जिनको आप आसानी से किसी भी प्लेटफार्म पर शेयर कर सकते हैं.

 

 Allama Iqbal Shayari in Hindi

 

फूलों की पत्तियों से कट सकता है हीरे का जिगर
मर्दे नादान पर कलाम-ऐ-नरम-ऐ-नाज़ुक बेअसर

 

खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर मुकद्दर से पहले
खुदा भी बंदे से खुद पूछे कि बता तेरी रजा क्या है

 

जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला कर रख दो

 

देख कैसी क़यामत सी बरसी हुई है आशियानों पर इक़बाल
जो खून से तामीर हुए थे , पानी से बह गए

 

हया नहीं है दुनिया की आँख में बाक़ी
अल्लाह करे कि जवानी तिरी रहे बे-दाग़

 

Heart touching shayari by Allama Iqbal

 

ख़ुदावंदा ये तेरे सादा-दिल बंदे आखिर किधर जाएँ
कि दरवेशी भी अय्यारी है और सुल्तानी भी अय्यारी

 

अमल करने से ज़िन्दगी बनती है , जन्नत भी और जहनुम भी
यह कहा की अपनी फितरत में न नूरी है और न नारी है

 

जफा जो मोहब्बत में होती है वह जफा ही नहीं,
सितम न हो तो इश्क़ में कुछ मजा ही नहीं

 

अपने दिल में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी
तू अगर मेरा नहीं बनता न बन लेकिन अपना तो बन

 

पानी पानी कर गयी मुझको उसकी वो बातें
तू झुका जो गैरों के आगे न तन तेरा और न मन तेरा

 

ढूंढता रहता हूं ऐ ‘इकबाल’ मैं अपने आप को,
आप ही गोया मुसाफिर और आप ही मंजिल हूं मैं।

 

Best Shayari by Allama Iqbal

 

इक़रार -ऐ-इश्क़ ऐहदे-ऐ.वफ़ा सब झूठी सच्ची बातें हैं “इक़बाल”
हर शख्स खुदी की मस्ती में बस अपने लिए ही जीता है

 

दिल की बस्ती एकअजीब बस्ती है,
लूटने वाले के लिए तरसती है।

 

कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राहगीर को
खटक सी है जो कभी सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए

 

ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई भी किनारा नहीं
तू आबजू इसे समझा अगर तो कोई चारा नहीं

 

मोहब्बत क़ातिल से भी मक़तूल से हमदर्दी भी
यह बता किस से इश्क़ की जज़ा मांगेगा
सजदा ख़ालिक़ को भी और इबलीस से याराना भी
हसर में किस से अक़ीदत का तू सिला मांगेगा

 

मिटा कर रख दे अपनी हस्ती को गर कुछ मर्तबा चाहिए
कि दाना खाक में मिलकर ही, गुले-गुलजार होता है

 

आईन-ए-जवाँ-मर्दां हक़-गोई ओ बे-बाकी
खुदा के शेरों को आती नहीं रूबाही

 

सौदागरी नहीं , यह इबादत अल्लाह की है
ओ बेखबर ! जज़ा की तमन्ना भी छोड़ दे

मुझे रोकेगा तू ऐ नाखुदा क्या मुझे गर्क होने से
कि जिसे डूबना हो, डूब जाते हैं वो सफीनों में

 

किसे ख़बर कि सफ़ीने डुबो चुकी हो कितने
फ़क़ीह ओ सूफ़ी ओ शाइर की ना-ख़ुश-अंदेशी

 

Mohammad Iqbal urdu shayari

 

उम्र भर तेरा इश्क़ मेरी खिदमत रही
मैं तेरी खिदमत के क़ाबिल जब हुआ तो तू ही चल बसी

 

कई  साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है
बहुत मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा

 

कभी हम से और कभी ग़ैरों से शनासाई है
बात कहने की नहीं तू भी तो एक हरजाई है

 

किसी की याद ने ज़ख्मो से भर दिया मेरा सीना
हर एक सांस पर शक है के शायद आखरी होगी

 

अल्लाह के बन्दे तो हैं हजारों बनो में फिरते हैं मारे-मारे
मैं उसका बन्दा बनूंगा जिसको अल्लाह के बन्दों से प्यार होगा

 

और भी कर देता है ज़ख्मों में इज़ाफ़ा
तेरे होते हुए गैरों का मुझे दिलासा देना

 

Allama Iqbal ki mashhoor shayari

 

कुशादा दस्त-ए-करम जब वो बे-नियाज़ करे
नियाज़-मंद न क्यों आजिज़ी पर नाज़ करे

 

चाँद-सितारों से आगे जहां और भी हैं
अभी मोहब्बत के इम्तिहां और भी हैं

 

बड़े इसरार पोशीदा हैं इस तन्हाई पसंदी में .
ये न समझो कि दीवाने जहनदीदा नहीं होते .
ताजुब क्या अगर इक़बाल इस दुनिया तुझ से नाखुश है
सारे लोग दुनिया में पसंददीदा नहीं होते .

 

सख्तियां करता हूं दिल पे गैरों से गाफिल हूं मैं
हाय क्या अच्छी कही जालिम हूं, इक जाहिल हूं मैं

 

दिमाग को तन्क़ीद से फ़ुर्सत नहीं
मोहब्बत पर आमाल की बुनियाद रख

 

तेरी मोहब्बत का इन्तहा चाहता हूँ
मेरी सादगी देख मैं क्या चाहता हूँ
भरी बज़्म में मैंने राज़ की बात कह दी
बड़ा बे-अदब हूँ , मैं सज़ा चाहता हूँ

 

साकी के इश्क़ में दिल साफ हुआ इतना
जब सर को झुकाता हूं तो शीशा नजर आता है

 

तुझे किताबों से मुमकिन नहीं फ़राग़ कि तू
किताब-ख़्वाँ है लेकिन साहिब-ए-किताब नहीं

 

अब ज़माना आया है बे–हिजबी का , आम दीदार-ऐ-यार होगा ;
सकूत था पर्देदार जिसका, वो राज़ तो अब आशकार होगा .

 

ये मुमकिन है कि तू जिसको समझता है बहारां
औरों की नज़रों में वो मौसम हो खिजां का

 

Mohammad iqbal ki kavitayein

 

ऋषियों के फ़ाक़ों से टूटा न बरहमन का तिलिस्म
असा न हो तो कलीमी भी है कार-ए-बे-बुनियाद

 

इस ज़माने की ज़ुल्मत में हर कल्बे परेशान को
वो दाग़े इश्क़ दे जो चाँद को शर्मा दे

 

तेरी ख्वाहिश से कज़ा तो बदल नहीं सकती
मगर है इस से यह मुमकिन की तू ही बदल जाये

 

तेरी दुआ है की हो तेरी हर आरज़ू पूरी
मेरी दुआ है कि तेरी आरज़ू बदल जाये

 

तू है एक मुहीत-ए-बे-कराँ मैं हूँ ज़रा सी आबजू
या मुझे हम-कनार कर या फिर मुझे बे-कनार कर

 

हंसी आती है अब मुझे हसरते इंसान पर
गुनाह करता है खुद लेकिन लानत भेजता है सैतान पर

आज फिर तेरी यादें मुश्किल बना देगी
सोने से पहले ही मुझे रुला देगी
आँख लग गई हो भले से तो डर है
लगता है कोई आवाज़ फिर मुझे जगा देगी

 

ऐ ताइर-ए-लाहूती उस रिज़्क़ से अंत अच्छा
जिस भी रिज़्क़ से आती हो परवाज़ में कोताही

 

किसी के मोहब्बत के हम-ओ-ख्याल थे हम भी कभी
गुजरे हुए ज़माने में बहुत बा-कमाल थे हम भी कभी

 

तू ने तो क्या ग़ज़ब किया मुझ को भी फ़ाश कर दिया
मैं ही तो इक राज़ था सीना-ए-काएनात में

 

उमीद-ए-हूर ने बहुत कुछ सिखा रक्खा है वाइज़ को
ये हसरत देखने में बहुत सीधे-सादे भोले-भाले हैं

 

उसकी फितरत परिंदों जैसी थी मेरा मिज़ाज दरख़्तों जैसा
उसको उड़ जाना था और मुझे कायम ही रहना था

 

Mohammad Iqbal ki kavita

 

तू क़ादिर ओ आदिल है लेकिन तेरे जहाँ में
हैं तल्ख़ बहुत है बंदा-ए-मज़दूर के औक़ात

 

‘अत्तार’ हो ‘रूमी’ हो ‘राज़ी’ हो और ‘ग़ज़ाली’ हो
कुछ हाथ में नहीं आता बे-आह-ए-सहर-गाही

 

 मेरे जैसा कोई शख्स नादान भी न हो
करे जो इश्क़ कहता है और नुकसान भी न हो

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमान अभी और भी हैं
फूल चाहे थे मगर हाथ में आए केवल पत्थर ,
हम ने आगोश- ऐ-मोहब्बत में सुलाये केवल पत्थर ..
उक़ाबी रूह जब बेदार होती है सारे जवानों में
नज़र आती है उन को अपनी मंज़िल अब आसमानों में
उठा कर चूम ली हैं मैंने चंद मुरझाई हुई कलियाँ ,
न तुम आये तो यूं जश्न -ऐ -बहाराँ कर लिया मैने ..
ज़माम-ए-कार अगर मज़दूर के हाथों में हो तो फिर क्या
तरीक़-ए-कोहकन में भी वही हीले हैं परवेज़ी

Motivational shayari by Allama Iqbal

रब तो मिलता है ,मगर इंसान ही नहीं मिलता ,
ये चीज़ वो है जो देखी है कहीं कहीं मैंने ..
आँख जो कुछ देखती है लब पे आ सकता नहीं
महव-ए-हैरत हूँ कि ये दुनिया क्या से क्या हो जाएगी
जिन के भी आँगन में अमीरी का शजर लगता है ,
उन का हर ऐब भी इस ज़माने को हुनर लगता है …
ज़माना दिमाग को समझा हुआ है मिशअल-ए-राह
किस को ख़बर कि जुनूँ भी है साहिब-ए-इदराक
तेरी इंसा परवारी से मेरे दिन गुज़र रहे हैं
न गिला है यारों का , न शिकायत -ऐ -ज़माना
बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म का सफ़र दिया था क्यों
कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मेरा थोड़ी इंतिज़ार कर
बुतों से तुझ को उमीदें अल्लाह से नौमीदी
मुझको बता तो सही और काफ़िरी क्या है

Allama Iqbal Inqabi shayari

इक सरमस्ती ओ हैरत है सरापा तारीक
इक सरमस्ती ओ हैरत है तमाम आगाही
दिल से जो बात निकलती है वोअसर रखती है
लेकिन नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है
गले को तो घोंट दिया अहल-ए-मदरसा ने तेरा
भला कहाँ से आए सदा ला इलाह इल-लल्लाह
रहमत है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल
लेकिन कभी कभी तो इसे तन्हा भी छोड़ दे
गेसू-ए-ताबदार को थोड़ा और भी ताबदार कर
होश ओ ख़िरद शिकार कर क़ल्ब ओ निगाह शिकार कर
दिल सोज़ से ख़ाली है नज़रें पाक नहीं है
फिर इस में अजब भला क्या कि तू बेबाक नहीं है
इल्म में भी सुरूर है मगर
ये वो जन्नत है जिस में कोई हूर नहीं
दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या खुदा
क्या लुत्फ़ भला अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
ग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न ही तदबीरें
जो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं सारी ज़ंजीरें
फ़क़त नज़र से होता है फ़ैसला दिल का
न हो नज़र में शोख़ी तो दिलबरी क्या है
अंदाज़-ए-बयाँ गरचे बहुत शोख़ नहीं है
शायद कि उतर जाए तेरे दिल में मेरी बातें
अपनी फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर
ज़रा तस्ख़ीर-ए-मक़ाम-ए-रंग-ओ-बू कर
मत पूछो मुझ से लज़्ज़त ख़ानमाँ-बर्बाद रहने की
नशेमन सैकड़ों मैं ने बना के फूँक डाले हैं

Mohammad Iqbal ‘Allama’ ki kavitayein

गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बूद न बेगाना-वार तो देख
है देखने की चीज़ इसे तू बार बार देख
गुज़र जा दिमाग से आगे कि ये नूर
चराग़-ए-राह है लेकिन मंज़िल नहीं है
नहीं है ना-उमीद ‘इक़बाल’ अपनी किश्त-ए-वीराँ से
ज़रा नम हो जाये तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी
अगर हंगामा-हा-ए-शौक़ से है ला-मकाँ ख़ाली
गलती किस की है या रब ला-मकाँ तेरा है या मेरा
जब मोहब्बत सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद-आगाही
तब खुलते हैं ग़ुलामों पर असरार-ए-शहंशाही
Read more:
नहीं है इस खुली फ़ज़ा में कोई गोशा-ए-फ़राग़त
ये जहाँ अजब जहाँ है न क़फ़स है न आशियाना
मोहब्बत तेरी इंतिहा इश्क़ मिरी इंतिहा
तू भी अभी ना-तमाम और मैं भी अभी ना-तमाम

Inspirational shayari by Allama Iqbal

जलाल-ए-बादशाही हो कि जमहूरी तमाशा हो
दूर हो दीं सियासत से तो रह जाती है चंगेज़ी
नशा पिला कर गिराना तो हर किसी को आता है
मज़ा तो तब है जब गिरतों को थाम ले साक़ी
अनोखी वज़्अ’ है सारी दुनिया से निराले हैं
ये दीवाना कौन सी बस्ती के या-रब रहने वाले हैं
नज़र-ए-इश्क़ दिल-ए-ज़िंदा की तलाश में है
शिकार-ए-मुर्दा सज़ा-वार-ए-शाहबाज़ नहीं है
नज़र बुलंद सुख़न दिल-नवाज़ जाँ पुर-सोज़
यही है रख़्त-ए-मंज़िल मीर-ए-कारवाँ के लिए
पास था असफल-ए-सय्याद का ऐ हम-सफ़ीर
वर्ना मैं और उड़ के आता एक तिनके के लिए
इसी गलती से इताब-ए-मुलूक है मुझ पर
कि जानता हूँ की मआल-ए-सिकंदरी क्या है
जिन्हें मैं ढूँढता रहा आसमानों में ज़मीनों में
वो निकले मेरे ज़ुल्मत-ख़ाना-ए-जिगर के मकीनों में

Mohammad Iqbal ki kavita

ताही ज़िंदगी से नहीं हैं ये फिज़ाएँ
यहाँ सैंकड़ों कारवाँ अभी और भी हैं

अगर खो गया एक नशेमन तो किया गिला
मक़ामात-ऐ-आह-ओ-फ़िगन अहा और भी हैं

तू शाहीन है , और परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने अभी आसमान और भी हैं

इसे रोज़-ओ-शब में उलझ कर मत रह जा
कह तेरे ज़मान-ओ-मकाँ अभी और भी हैं

गए दिन के अकेला था मैं अंजुमन में
यहाँ अब मेरे राज़दान अभी और भी हैं

संक्षेप में

दोस्तों, आज हमने इस आर्टिकल (Allama Iqbal Shayari in Hindi – 90+ Shayari for Whatsapp) के ज़रिये आपके सामने अल्लामा इक़बाल की मशहूर शायरी प्रस्तुत करीं, जिनको आप कॉपी पेस्ट करके अलग अलग सोशल नेटवर्किं साइट्स पर आसानी से शेयर कर सकते हैं. ये शायरी हमारे एक्सपर्ट्स द्वारा छांटी हुई कुछ सबसे सुन्दर शायरी हैं. इसके अलावा, इस पोस्ट के ज़रिये हमने आपको अल्लामा इक़बाल का जीवन परिचय.

हम उम्मीद करते हैं की आपको हमारा लिखा हुआ ये पोस्ट (Allama Iqbal Shayari in Hindi – 90+ Shayari for Whatsapp) पसंद आया होगा. यदि यह पोस्ट आपको पसंद आया हो तो इसे अपने दोस्तों, फॅमिली मेंबर्स, रिलेटिव्स के साथ भी शेयर करें ताकि वे लोग भी ज़रूरत पड़ने पर अच्छी अच्छी शायरी यहाँ से प्राप्त कर सकें. हमें राय और सुझाव देने के लिए निचे कमेंट बॉक्स का प्रयोग करें.

Leave a Comment